यूँ तो कविता को भूमिका की ज़रूरत नहीं होनी चाहिये लेकिन इस कविता के बारे में कुछ कहना ज़रूरी है । २ अक्टूबर १९७८ के दिन एक सच्ची घटना पर प्रतिक्रिया के रूप में यह लिखी गई थी । उस दिन दो राजनैतिक दलों के बीच राजघाट पर इस बात पर झगड़ा हुआ कि महात्मा गांधी की समाधि को पहले कौन धोयेगा ? लाठी , पत्थर और गोलियों के साथ अहिंसा के पुजारी की समाधि पर हिंसा का नंगा खेल खेला गया । एक आहत मन से लिखी थी यह कविता और उस समय बहुत संतोष मिला था , इसे लिख कर ।
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बापु ,
देखो आज हम
तुम्हारी समाधि धोने आये हैं,
ये बात अलग है कि साथ में
लाठी, पत्थर और आँसू गैस के खिलौने लाये हैं,
लेकिन सच सच बतायें बापु,
ये समाधि को धोना वोना
तो बेकार की बात है ,
अरे हम तो इस युग के नाथू राम गोड़से हैं
जो अपना अपना अधूरा काम करनें आये हैं
शरीर से तो तुम्हे कब का मार चुके
आज तुम्हारी आत्मा तमाम करने आये हैं ।
11 comments:
बहुत सुन्दर कविता।
आजकल की सच्चाई को बयां करती हुई।
सुन्दर.
आज भी प्रासंगिक है और शायद सर्वकालिक भी.
इसने उसकी क्या कीमत दी जो वो एक फ़कीर दे गया
इसने उसकी लाठी पकड़ी, जैसे वो शमशीर दे गया
राजघाट पर शीश नवा कर, दो बिल्ली में रार करा कर
ये उसका अनुयायी कहकर, भारत की तकदीर ले गया
बहुत सुन्दर कविता, अनूप भाई. पुनः बधाई.
ब्लोग यानी कि "जाल - घर " वास्तव मेँ अपने मन की बातोँ को साहस के साथ, समस्त विश्व के सामने रखना -
हम लोग सभी , अपने मत रखते हैँ जो जीवन के कई उतार चढावोँ के साथ पले होते हैँ
गाँधीजी ने देश -भक्ति की - प्राण गँवाये - देश आजाद हुआ समाधि पर फूल चढते रहे -
कई शहीद अपना नाम दर्ज कराये बिना ही चले गये.
परँतु, मेरी श्रध्धाँजली हर एकशहीद के लिये, है -
भारत माँ का मस्तक उन्नत रहे !
इसी प्रार्थना के साथ, आपकी सुँदर कविता के लिये, मेरी मुबारकबादी स्वीकारेँ अनूप भाई !
.स - स्नेह,
- लावण्या
अनूप जी बहुत ही भावपूर्ण रचना है और हम सच्चाई को नकार भी नहीं सकते यही होता आ रहा जिन लोगों ने अपना सारा जीवन देश की आज़ादी में लगा दिया उनको हम श्रद्धाजंलि भी ठीक से नहीं दे पाते उसके लिये भी आपसी झगड़ों में उन सच्चे सेवकों को साईड में कर देते हैं।
Man ki tees bah chali kavita ban, badhayi apki baat man tak pahunchi...
आज बैठ कर आपके सभी बुने ख्वाबों को देखा....
कभी मुस्कराई...कभी जोर से हँस पड़ी....एक ख्वाब से दूसरे पर बड़ी सहजता से तैर कर पहुँची...डुबकी ली...शायद कुछ ख्वाबों के बूँद मेरे साथ बाहर चले आये....
आप को एंव आपके समस्त परिवार को होली की शुभकामना..
आपका आने वाला हर दिन रंगमय, स्वास्थयमय व आन्नदमय हो
होली मुबारक
अनूपजी गांधीजी के विचारो को अगर हमलोग जरा भी अपनी जिंदगी में उतार लेते तो शायद कभी भी गांधीजी की समाधि को धोने या चौराहे पर उनकी मूर्ति लगाने को लेकर किसी से ना झगडते।
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