काफ़ी दिन से कुछ नया लिखना नहीं हो पाया ।
कल बेजी की कविता पढी तो कुछ लिखने का मन हुआ ।
बेजी की अनुमति से प्रस्तुत है पहले उस की कविता इस रंग में और फ़िर मेरी कुछ पँक्तियां इस रंग में :
दूरी
किसी वृत्त में
दो बिंदु की तरह मिले....
पास पास
मैं आगे थी...
वो पीछे...
अजीब जिद थी
कि बीच का फासला
मैं तय करूँ......
और बस यूँ ही
फासले बढ़ गये
चलो यूँ कर लें....
अगर तुम्हारी ज़िद है
कि फ़ासला मै ही तय करूँ ,
तो वायदा करो
तुम मेरा इन्तज़ार करोगे ,
मैं ही कुछ तेज चल लेती हूँ
वृत्त में दूरियां
पहले तो बढेंगी
फ़िर धीरे धीरे
मैं तुम में विलीन हो जाऊँगी ।
परिधि की अगली परिक्रमा में
मेरे साथ चलोगे ना ?
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3/27/2008
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