4/04/2005

Just the Begining

Everyone has to start somewhere. So here I go.
Bear with me. Things can only get better from this point onwards. :-)

9 comments:

राकेश खंडेलवाल said...

भटक रहा था अन्तर्जाली भूलभुलैय्या में मेरा मन
मिला ब्लाग मुझे यह कहता, हां मुझको भी कुछ कहना है
एक बार जो पढ़ा दुबारा पढ़ने की ख्वाहिश फिर जागी
अब तो ऐसा लगता इसको बार बार मुझको पढ़ना है
कहा आपने just the begining तो अब पूर्ण कथा भी लिख दें
आप कहेंगे और इसे हमको भी हर दिन आ पढ़ना है

Amarendra Kumar said...

AnoopJi,

Aap kee rachanayen padheen. Bahut achchhee likhate hain aap.
Regards,
Amarendra

Devi Nangrani said...

Anoop
rRachnaOn mein sarla samaan roop se samayee hui hai. Bhav Hriday se chalak kar Lekani ki dhar se bahte hue se....

Devi

madhuri said...

anoopji,
pooree rachana padh leeN.
bahut hi pyaaree,saral aur dil ko chhoo lenewali hain.
badhai.
madhu.

subhash_bhadauriasb@yahoo.com said...

अनूपजी आपकी रचनाएं पढ़ी.मुक्तकों में आप वज़न का निर्वाह कर लेते हैं.ग़ज़ल की बहरें (मीटर)आप जान लें. वैसे मुक्तकों में आप 122 212 उर्दू बहर फऊलुन मुतकारिब, मुतदारिक प्रयुक्त कर बैठे हैं. रचनाओं में शिल्प की जगह कथ्य की प्रामाणिकता अवश्य ध्यान खीचती है.

अनूप भार्गव said...

सुभाष जी :
आप नें मुझे पढनें के लिये समय निकाला , इस के लिये धन्यवाद ।
आप नें ठीक कहा है । कविता को मैनें कभी तरीके से लिखना नहीं सीखा इसलिये शिल्प की दष्टि से गलतियां ज़रूर होंगी ।
आप नें जिन 'बहर' या मीटर का ज़िक्र किया , मुझे उस की बिल्कुल भी जानकारी नही है । जो भी प्रयोग किया है, बस हो गया है ।
गज़ल को सीखनें की इच्छा है , अगर आप मार्गदर्शन कर सकें तो आभार होगा ।

Anonymous said...

VERY VERY FENTASTIC
SO MANY GREETINGS
BAHUT ACHCHEE HAIN KAVITAYEN
BAHUT BAHUT ACHCHEE
-----FROM -MATHURA (U.P)
----PUSHPENDRA SINGH

shyamskha said...

अनूप जी आप की काव्य बगिया में विचरण कर सुवासित हुआ। अभिव्यक्ति आपकी अभिव्यक्ति व्यैक्तिगत होते हुए भी गमे-दौरां तक पहुंच रही है।लगे रहें कलम व कलाम के सफर में।शुभकामनाय़ें।मुक्तक मुझे अधिक भाये। श्यामसखा‘श्याम’

Vishu said...

Hi Sir,


This is really tooo gooood.

I like it....

Vishnu Kumar Chandel