8/14/2012

तुम

 
तुम कई बार
इस तरह
चुपचाप,
मेरे ज़हन में
आ कर बैठ जाती हो
कि मुझे
अपनी तनहाई
का भरम होने लगता है ,
और मैं
फ़िर से
तुम्हारे बारे में
सोचने लग जाता हूँ ।

8/28/2011

कुछ तो करना है ....


ये माना कि मेरी
एक आवाज़ के उठ जाने से
शायद कुछ नहीं होगा

लेकिन ये भी तय है ...

मेरे इस वक्त चुप रह जाने से
आने वाली पीढियों तक
यकीनन कुछ नहीं होगा ।

---
अन्ना हजारे के समर्थन में

2/22/2009

एक ख़याल


जब शब्द
अधिक महत्वपूर्ण होने लगें
और भावनाएं गौण
तो कोलाहल में भी
बोलने लगता है मौन

ऐसे में
शब्दों के अर्थ बदल लेना ही उचित है ।
---

2/05/2009

तुम्हारे शब्द मुझ तक पहुँच ही कहां पाते हैं

तुम्हारे शब्द मुझ तक पहुँच ही कहां पाते हैं ?

अक्सर जमाने की
ज़बरदस्ती ओढाई गई
तहज़ीब की चाशनी में
फ़िसल के लौट जाते हैं ,

तुम्हारे शब्द मुझ तक पहुँच ही कहां पाते हैं ?

तुम्हारे होठों के गोल होने से शुरु हो कर
शब्दों के मेरे कान तक पहुँचने का समय
एक युग के समान लगता है ,
किताबों में पढा था ,
प्रकाश की गति ध्वनि से तेज हुआ करती है ,
शायद इसीलिये

तुम्हारे आंखो से कहे बोल
तुम्हारी आवाज़ से पहले ही
मेरी आंख की कोर तक पहुँच कर ठहर जाते है ।

तुम्हारे शब्द मुझ तक पहुँच ही कहां पाते हैं ?

6/16/2008

मुक्तक


मीठी यादों की एक निशानी देखूँ
जज़्बों में पहचान पुरानी देखूँ
मैं जिसमे किरदार हुआ करता था
तेरे चेहरे पे वो कहानी देखूँ ।

3/27/2008

एक संवाद बेजी के साथ .....

काफ़ी दिन से कुछ नया लिखना नहीं हो पाया ।
कल बेजी की कविता पढी तो कुछ लिखने का मन हुआ ।

बेजी की अनुमति से प्रस्तुत है पहले उस की कविता इस रंग में और फ़िर मेरी कुछ पँक्तियां इस रंग में :

दूरी

किसी वृत्त में
दो बिंदु की तरह मिले....
पास पास
मैं आगे थी...
वो पीछे...
अजीब जिद थी
कि बीच का फासला
मैं तय करूँ......
और बस यूँ ही
फासले बढ़ गये



चलो यूँ कर लें....


अगर तुम्हारी ज़िद है
कि फ़ासला मै ही तय करूँ ,
तो वायदा करो
तुम मेरा इन्तज़ार करोगे ,
मैं ही कुछ तेज चल लेती हूँ
वृत्त में दूरियां
पहले तो बढेंगी
फ़िर धीरे धीरे
मैं तुम में विलीन हो जाऊँगी ।

परिधि की अगली परिक्रमा में
मेरे साथ चलोगे ना ?



3/21/2008

कभी लिखा था ...

१.
जज़्बातों की उठती आँधी
हम किसको दोषी ठहराते
लम्हे भर का कर्ज़ लिया था
सदियां बीत गई लौटाते ।

२.
वो लड़ना झगड़ना रूठना और मनाना
किस्से सभी ये पुराने हुए हैं
वो कतरा के छुपने लगे हैं हमीं से
महबूब मेरे सयाने हुए हैं ।

11/12/2007

जाने सूरज जलता क्यों है


जाने सूरज जलता क्यों है
इतनी आग उगलता क्यों है

रात हुई तो छुप जाता है
अंधियारे से डरता क्यों है

सुबह का निकला घर न आया
आवारा सा फ़िरता क्यों है

सुबह शाम और दोपहरी में
अपनें रंग बदलता क्यों है

अगर सुबह को फ़िर उगना है
तो फ़िर शाम को ढलता क्यों है

11/09/2007

दिवाली


पुरखो का वरदान दिवाली
अपनो से पहचान दिवाली

एक बरस में ही आती है
दो दिन की मेहमान दिवाली

हंसी खुशी की एक लहर है
मीठी सी मुस्कान दिवाली

लड्डू, पेड़े, गुंझिया बरफ़ी
इक मीठा पकवान दिवाली

जीवन की आपाधापी में
प्रश्न एक आसान दिवाली

नया बरस खुशियां लायेगा

कुछ ऐसा अनुमान दिवाली

चांद सितारे अंबर में हैं
धरती का अभिमान दिवाली

अपनों से जब दूर हो बैठे
लगती है सुनसान दिवाली

मधुर क्षणों की अनुभूति ये
कविता का उन्वान दिवाली

-------

दीप पर्व की मंगल कामनाओं के साथ :

रजनी-अनूप
अनुभव-कनुप्रिया

8/25/2007

एक ऐब्सट्रैक्ट सी रुबाई

आयोजनाएं मेरे मस्तिष्क में पला करती हैं
संभावनाएं मेरे गीतों से जन्म लिया करती हैं
रात का मरुस्थल सपनों के धरातल पर उनींदा सा क्यो पड़ा है
रात आलिंगन से शुरु होती है, रात आलिंगन में खत्म हुआ करती है।

4/14/2007

कौन कहता है

कौन कहता है
भाग्य की रेखाएं
बदल नहीं सकती ?

मुझे याद है
जब तुमने पहली बार
अपनी कोमल उँगलियों से
मेरी हथेली को कुरेदा था ,

कौन कहता है
भाग्य की रेखाएं
बदल नहीं सकती ?

4/06/2007

मुक्तक

वो लाज को आँखों में छुपाये तो छुपाये कैसे
वो मुझ से दूर भी अगर जाये तो जाये कैसे
वो मेरी रूह की हर रग रग में शामिल है
वो मुझ से बदन को चुराये तो चुराये कैसे ?

1/30/2007

दूसरी हत्या

यूँ तो कविता को भूमिका की ज़रूरत नहीं होनी चाहिये लेकिन इस कविता के बारे में कुछ कहना ज़रूरी है । २ अक्टूबर १९७८ के दिन एक सच्ची घटना पर प्रतिक्रिया के रूप में यह लिखी गई थी । उस दिन दो राजनैतिक दलों के बीच राजघाट पर इस बात पर झगड़ा हुआ कि महात्मा गांधी की समाधि को पहले कौन धोयेगा ? लाठी , पत्थर और गोलियों के साथ अहिंसा के पुजारी की समाधि पर हिंसा का नंगा खेल खेला गया । एक आहत मन से लिखी थी यह कविता और उस समय बहुत संतोष मिला था , इसे लिख कर ।
-

बापु ,
देखो आज हम
तुम्हारी समाधि धोने आये हैं,
ये बात अलग है कि साथ में
लाठी, पत्थर और आँसू गैस के खिलौने लाये हैं,

लेकिन सच सच बतायें बापु,
ये समाधि को धोना वोना
तो बेकार की बात है ,
अरे हम तो इस युग के नाथू राम गोड़से हैं
जो अपना अपना अधूरा काम करनें आये हैं
शरीर से तो तुम्हे कब का मार चुके
आज तुम्हारी आत्मा तमाम करने आये हैं ।

1/10/2007

मुक्तक

गुनगुनी सी हवा है बहूँ ना बहूँ
अजनबी वेदना है सहूँ ना सहूँ
मुस्कुराते हुए गीत और छन्द में
अनमनी सी व्यथा है कहूँ ना कहूँ ?

12/23/2006

दो मुक्तक

तुम को देखा तो चेहरे पे नूर आ गया
हौले हौले ज़रा सा सुरूर आ गया
तुम जो बाँहों में आईं लजाते हुए
हम को खुद पे ज़रा सा गुरूर आ गया

---

ज़िन्दगी गुनगुनाई , कहो क्या करें ?
चाँदनी मुस्कुराई, कहो क्या करें ?
मुद्दतों की तपस्या है पूरी हुई
आप बाँहों में आईं, कहो क्या करें ?

12/02/2006

दो ताजा शेर

तेरे इश्क के ज़ुनून में हम ने ये अजब काम किया है
पहले तुझे आवाज़ दीं फ़िर खुद ही ज़वाब दिया है ।

---

छू लिया आ कर के तूने इस तरह मेरा वज़ूद
साँस भी तेरी मुझे अब अपने जैसी ही लगे है

11/19/2006

तुम जब से रूठी हो

तुम जब से रूठी हो
मेरे गीत अपना अर्थ खो बैठे हैं
मेरे ही गीत मुझ से ही खफ़ा हो
मुझ से दूर जा बैठे हैं

माना कि तुम मुझ से नाराज़ हो
लेकिन मेरे गीतों से तो नहीं
क्या तुम उनको भी मनानें नही आओगी ?

मेरे गीत फ़िर से नया अर्थ पानें को बेताब हो रहे हैं ।

10/22/2006

एक मुक्तक

हार कर जो न हारे, जवानी लिखो
दिल में गड़ जाये गहरी, निशानी लिखो
ख्वाब की आबरु को बचाना ही है
उन अधूरे पलों को, कहानी लिखो ।

10/20/2006

शुभ कामनाएं

दीपिका की ज्योत बस जलती रहे
स्नेह की सरिता यूँ ही बहती रहे
आप जैसे दोस्तों का साथ हो
ज़िन्दगी यूँ ही सदा हँसती रहे

दीप पर्व की ढेर सारी शुभ कामनाओं के साथ :

10/09/2006

पाँच मुक्तक .... तुम्हारे लिये

१.
प्रणय की प्रेरणा तुम हो
विरह की वेदना तुम हो
निगाहों में तुम्ही तुम हो
समय की चेतना तुम हो ।

२.
तृप्ति का अहसास तुम हो
बिन बुझी सी प्यास तुम हो
मौत से अब डर नहीं है
ज़िन्दगी की आस तुम हो ।

३.
सपनों का अध्याय तुम्ही हो
फ़ूलों का पर्याय तुम्ही हो
एक पंक्ति में अगर कहूँ तो
जीवन का अभिप्राय तुम्ही हो ।

४.
सुख दुख की हर आशा तुम हो
चुम्बन की अभिलाशा तुम हो
मौत के आगे जाने क्या हो
जीवन की परिभाषा तुम हो ।

५.
ज़िन्दगी को अर्थ दे दो
इक नया सन्दर्भ दे दो
दूर कब तक यूँ रहोगी
नेह का सम्पर्क दे दो ।

9/25/2006

कोई शब्द नहीं है ...


प्रत्यक्षा नें एक पुरानी कविता की याद दिलाई तो ईकविता के झरोखे से जा कर वह कविता भी निकाली जिस की प्रतिक्रिया के रूप में यह कविता लिखी गई थी ।

प्रत्यक्षा की कविता पहले और फ़िर अपनी दे रहा हूँ :

बात तुम से कहनें के लिये
मैं खोलती हूँ
शब्दों के पिटारे
पर उड़ जाते हैं कभी
तितली बन कर
एक फ़ूल से
फ़ूल दूसरे,
और कभी हाथ आई
मछलियों की तरह
फ़िसल जाते हैं
गिरफ़्त से

तुम्ही कहो
मैं क्या करूँ
तुम तक पहुँचनें को
पास मेरे अब
कोई शब्द नहीं
---
प्रत्यक्षा

अब समझ आया है मुझ को ,
हर फ़ूल में क्यों आ रही थी तेरी खुशबू ,
तितलिओं नें काम ये अच्छा किया है ।

और वो नदी जो
तुम्हारे गाँव से
मेरे घर तक आती है
सुना है
रात उस में खलबली थी
मछलियां आपस में कुछ बतिया रहीं थी
कुछ बात कह कर आप ही शरमा रहीं थी
क्या हुआ गर बात तुम जो कह न पाई
शब्द ही तो प्रेम की भाषा नहीं है ?

--
अनूप

8/31/2006

दो पंक्तियाँ :

रजनी के लिये :

तुम सिर्फ़ एक पँक्ति में कुछ इस तरह समाती हो
स्वयं अगरबत्ती सी सुलगती हो मुझ को मह्काती हो ।

8/17/2006

अहसास

तुम समन्दर का किनारा हो
मैं एक प्यासी लहर की तरह
तुम्हे चूमने के लिए उठता हूँ
तुम तो चट्टान की तरह
वैसी ही खड़ी रहती हो
मैं ही हर बार तुम्हे
बस छू के लौट जाता हूँ

8/09/2006

रिश्ते

रिश्तों को सीमाओं में नहीं बाँधा करते
उन्हें झूँठी परिभाषाओं में नहीं ढाला करते

उडनें दो इन्हें उन्मुक्त पँछियों की तरह
बहती हुई नदी की तरह
तलाश करनें दो इन्हें सीमाएं
खुद ही ढूँढ लेंगे अपनी उपमाएं

होनें दो वही जो क्षण कहे
सीमा वही हो जो मन कहे

7/30/2006

दो मुक्तक

१.

रात इक शबनमी है चले आइये
आँसुओं में नमी है चले आइये
अब उजाला कहीं दीख पड़ता नहीं
चाँदनी की कमी है चले आइये

२.

नज़ारे बेमिसाल देखे हैं
हादसे और कमाल देखे हैं
मैं ढूँढ रहा हूँ हल जिनका
तेरी चुप में सवाल देखे हैं ।


6/29/2006

सुबह

कब तक लिये
बैठी रहोगी
मुठ्ठी में धूप को,

ज़रा हथेली
को खोलो
तो सबेरा हो ...

6/26/2006

अगले खम्भे तक का सफ़र

याद है,
तुम और मैं
पहाड़ी वाले शहर की
लम्बी, घुमावदार,सड़क पर
बिना कुछ बोले
हाथ में हाथ डाले
बेमतलब, बेपरवाह
मीलों चला करते थे,
खम्भों को गिना करते थे,
और मैं जब चलते चलते
थक जाता था,
तुम आंखें बन्द कर के,

उँगलियों पर
कुछ गिननें का बहाना कर के
कहती थीं ,
बस उस अगले खम्भे तक और ।

आज बरसों के बाद

मैं अकेला ही
उस सड़क पर निकल आया हूँ ,
खम्भे मुझे अजीब निगाह से देख रहे हैं
मुझ से तुम्हारा पता पूछ रहे हैं ,
मैं थक के चूर चूर हो गया हूँ
लेकिन वापस नहीं लौटना है
हिम्मत कर के ,
अगले खम्भे तक पहुँचना है


सोचता हूँ
तुम्हें तेज चलने की आदत थी,
शायद अगले खम्भे तक पुहुँच कर
तुम मेरा इन्तजार कर रही होगी !

6/22/2006

प्रत्यक्षा से संवाद

यह कविता संवाद की तरह है। प्रत्यक्षा नें एक कविता लिखी थी, उस के ज़वाब में एक कविता लिखी गई प्रत्यक्षा नें फ़िर कुछ लिखा , फ़िर मैने । यहाँ पूरी कविता दे रहा हूँ । प्रत्यक्षा के लिखे अंश इस रंग में हैं , मेरे लिखे हुए इस रंग में। बताइयेगा प्रयोग कैसा लगा ?

एक टुकडा छत

वृक्ष की जडों के खोह में
अँधेरा कुलबुलाता था
थोडी सी रौशनी
मुट्ठी भर ज़मीन
और एक टुकडा छत
बस इतना ही काफी है
अँधेरे को अपने
काबू में करने के लिये,
मेरी छत
वहाँ से शुरु होती है
जहाँ से तुम्हारी
ज़मीन

खत्म होती है
रौशनी का
एक गोल टुकडा
बरस जाता है
किरणे बुन लेती हैं
अपनी दीवार
और हमारा घर
धूप ,साये, परिंदो
और बादल से
होड लगाता
झूम जाता है
हमारी आँखों में
एक टुकडा छत
वृक्ष की जडों के खोह में

कभी कभी इच्छा होती है
अपनें पैरों के नीचे की जमीन को
खिसका कर
वहाँ तक पहुँचा दूँ
जहाँ से तुम्हारी छत शुरु
होती है,
वो जमीन
जिस पर मेरे पाँव
अब भी टिके हुए हैं
और जिस पर हम नें
मिल कर ख्वाब देखे थे,
वो हसीन ख्वाब आज भी
अगरबत्ती की तरह सुलग रहे है,
पता नहीं खुशबु
तुम्हारी छत तक पहुँची
या नहीं ?

मेरी छत और तुम्हारी छत
की मुंडेर अब बराबर है
तभी तुम्हारी खुशबू
पहुँच जाती है
मुझ तक
मैं बारबार
नंगे पाँव भागकर,
छत पर क्यों आ
जाती हूँ
ये समझ गये हो न
अब !

मुंडेर चाहे
छत के बीच में हो
या सम्बन्धों में,
अच्छी नही लगती ।
छत की मुंडेर तो
लाँघना आसान है
लेकिन ....
तुम भी अपने
रोशनी के
गोल टुकडे से
पूछ कर देखो ना ?

मैंने
रौशनी के उस
गोल टुकडे को
हल्के से
फूँक दिया है
तुम्हारी तरफ
अब तुम्हारा
चेहरा भी
खिल गया है
मेरी तरह

वो रोशनी का
गोल टुकड़ा
क्षितिज से
उगता हुआ
जब मेरी खिड़की
पर आया
तो उस में
हर रोज़ से
कुछ ज्यादा

चमक थी ।
जानता हूँ
तुम्हारा घर
पूरब की ओर है,
क्या तुम
आज सुबह
जल्दी उठ गई थी ?

मैं रात सोई ही

कब थी
खिडकी से चेहरा टिकाये
अंधेरी रात में
कहीं दूर जो
दिया सा टिमटिमाता था
उसे ही देखती रही
सोचती रही
गुनती रही
शायद
तुम भी
ऐसे ही
अपनी खिडकी से
चेहरा टिकाये
मेरी खिडकी की तरफ
देखते होगे


टिमटिमाते हुए
दिये को
मैं भी
बहुत देर तक
देखता रहा
मन बहुत उदास सा था,
लेकिन फ़िर
तुम्हारी खिड़की की ओर
नज़र पड़ी,
तो बुझते हुए दिये
की लौ
अचानक तेज सी
लगने लगी ...

5/03/2006

दो कविताएं

देखो मान लो
कल रात
तुम मेरे
सपनों में
आई थीं ,

वरना
सुबह सुबह
मेरी आँखो की
नमी का मतलब
और क्या
हो सकता है ?

----

चलो
अब उठ जाओ
और
जमानें को
अपनें चेहरे की
ज़रा सी रोशनी दे दो

देखो
सूरज खुद
तुम्हारी खिड़की पर
तुम से रोशनी
मांगनें आया है ।

1/22/2006

हथेली पे सूरज उगाया है मैंने ...

ख्वाबों को ऐसे सजाया है मैंने
हथेली पे सूरज उगाया है मैंने ।

आओ न तुम , तो मर्जी तुम्हारी
बड़े प्यार से पर बुलाया है मैंनें ।

लिखा ओस से जो तेरा नाम ले के
वही गीत तुम को सुनाया है मैंने ।


जीवन की सरगम तुम्ही से बनी है
तुझे नींद में गुनगुनाया है मैंने ।

मेरे आँसुओं का सबब पूछते हो
कतरा था यूँ ही बहाया है मेंने ।

1/14/2006

सुनो ..... (दो कविताएं)

सुनो,
अब अपनी नज़रें उठाओ
और पाँव के अँगूठे से
जमीन को कुरेदना बन्द करो ,
मैं समझ गया पगली
लेकिन कोई ऐसे भी
अपने दिल की बात
कहता है ?

-----

सुनो ,
तुम जानती हो
मेरा अस्तित्व
तुम से शुरू हो कर
तुम पर खत्म होता है
फ़िर बता सकोगी
मुझे मेरा विस्तार
अनन्त सा क्यों लगता है ?

12/17/2005

आशंका

मैं हर रोज़
बचपन से पले विश्वासों को
क्षण भर में
काँच के गिलास की तरह
टूट कर बिखरते देखता हूँ ।

सुना है जीने के लिये
कुछ मूल्यों और विश्वासों
का होना ज़रूरी है,
इसलिये मैं
एक बार फ़िर से लग जाता हूँ
नये मूल्यों और विश्वासों
को जन्म देनें में
ये जानते हुए भी
कि इन्हें कल फ़िर टूटना है ।

ये सब तब तक तो ठीक है
जब तक मेरा स्वयं
अपनें आप में विश्वास कायम है,
लेकिन डरता हूँ
उस दिन की कल्पना मात्र से
जब टूटते मूल्यों और विश्वासों
की श्रंखला में
एक दिन
मैं अपनें आप में
विश्वास खो बैठूँगा ।
---

11/30/2005

दो मुक्तक

साकी तेरी महफ़िल में एक मेहमान अभी बाकी है
तेरी मय का, तेरे रूप का कदरदान अभी बाकी है
इस तरह कैसे उठ जाऊँ कहानी अधूरी छोड़ कर ऐसे
तूनें रुख से नकाब उठाया है मेरा इम्तहान अभी बाकी है ।

----

महफ़िल में थिरकनें को मचलता साज़ काफ़ी है
दिल में गहरी उतरने को तेरी आवाज़ काफ़ी है
नहीं संकोच कर साकी छीन ले जाम मदिरा का
मुझे मदहोश करनें को तेरा अंदाज़ काफ़ी है ।

---

11/21/2005

एक ज्यामितीय कविता

मैं और तुम
एक ही दिशा में
न जाने कब से चलती हुई
दो समान्तर रेखाएं हैं ।

आओ क्यों न इन
रेखाओं पर
प्यार का एक लम्ब डाल दें ?

मैं इसी लम्ब के
घुटनें पकड़ पकड़
शायद तुम तक
पहुँच सकूँ !

अनूप

फ़ुरसतिया जी ! दूसरी पँक्ति पर विशेष ध्यान दें :-)

11/19/2005

एक शेर देखिये

आसमां मे खलबली है, सब यही पूछा किये
कौन फ़िरता है ज़मीं पर, चाँद सा चेहरा लिये

10/07/2005

एक गज़ल फ़िर से .....

परिधि के उस पार देखो
------------------------

परिधि के उस पार देखो
इक नया विस्तार देखो ।

तूलिकायें हाथ में हैं
चित्र का आकार देखो ।

रूढियां, सीमा नहीं हैं
इक नया संसार देखो

यूं न थक के हार मानो
जिन्दगी उपहार देखो ।

उंगलियाँ जब भी उठाओ
स्वयं का व्यवहार देखो

मंजिलें जब खोखली हों
तुम नया आधार देखो ।

हाँ, मुझे पूरा यकीं है
स्वप्न को साकार देखो ।

---------

9/13/2005

एक मुक्तक

माना कि हर समस्या का निदान नहीं हूँ मैं
ये भी माना कि तेरे प्रश्न का समाधान नहीं हूँ मैं
लेकिन तुम्हारी प्रीति के आमँत्रण का मतलब नहीं समझूँ
मेरी बात मानों इतना नादान नहीं हूँ मैं ।


अनूप

8/28/2005

तुम ने खुशबु की तरह ......


शुरुआत तो गज़ल की कोशिश से हुई थी लेकिन बहर और वज़न सब गलत हैं । बस जो ठीक लगे , वही समझ कर पढ लें :


तुम ने खुशबु की तरह मुझ को चुराया होगा
एक अरसा लमहे में बिताया होगा ।


मैं तुम्हे ढूँढता रहा गुलशन गुलशन
तुम नें फ़ूलों में कहीं खुद को छुपाया होगा ।


मैं तो ख्वाब की मानिंद गुजर जाता हूँ
अपनी पलकों में मुझे तुम ने सजाया होगा ।


जब किसी ने कहीं पे मेरा नाम लिया
तुम नें उँगली में दुपट्टॆ को घुमाया होगा

तुम्हें न देखूँ अगर तो, दर्द उठता है कहीं
तुम नें भी टीस को हौले से दबाया होगा ।

अनूप भार्गव

7/20/2005

एक शेर लिखा है .....


वो पलक मूँद कर हौले से मुस्कुराये हैं
उन के तस्सवुर में जानें कौन आया है

अनूप

7/09/2005

प्रत्यक्षा की कुछ पँक्तियों पर ....

प्रत्यक्षा नें लिखा ....

सीने से निकल के दम गया था ,मुद्दतों हुए
कानों में जो आवाज़ उनकी पडी दम फिर निकल गया

इस पर अर्ज़ किया है ..

कुछ तो रहा होगा भुलाये रिश्तों में
दम भी निकल रहा है आज किश्तों में ।

अनूप

7/01/2005

समाधान ......

अंको के गणित
और तर्क की
ज्यामिती के दायरे
में कैद ज़िन्दगी
एक कठिन समीकरण
बन गई थी ।

तुम चुपके से आईं
और मेरे कान में
प्यार से
बस इतना ही कहा
'सुनो' .....

मैं मुस्कुरा दिया
और अचानक,
ज़िन्दगी के
सभी कटिन प्रश्न
बड़े आसान
से लगनें लगे ।

---
अनूप

6/28/2005

चलिये इसी दौर में .....

एक अरसा हुआ दम को निकले हुए
हाथ उस नें जो छूआ तो ज़ुम्बिश हुई ।

6/26/2005

यूँ ही बैठे बैठे .......

वो मैय्यत पे मेरी आये और झुक के कान में बोले
सचमुच मर गये हो या नया कोई तमाशा है .........

6/24/2005

आरती का दिया है .....



आरती का दिया है तुम्हारे लिये
ज़िन्दगी को जिया है तुम्हारे लिये

एक अरसा हुआ इस को रिसते हुए
ज़ख्म फ़िर भी सिया है तुम्हारे लिये

पाप की गठरियाँ तो हैं सर पे मेरे
पुण्य जो भी किया है तुम्हारे लिये

मैनें थक के कभी हार मानी नहीं
हौसला फ़िर किया है तुम्हारे लिये

जिन्दगी को हसीं एक मकसद मिला
साँस हर इक लिया है तुम्हारे लिये

6/21/2005

अस्तित्व


मैनें कई बार
कोशिश की है
तुम से दूर जानें की,
लेकिन मीलों चलनें के बाद
जब मुड़ कर देखता हूँ
तो तुम्हें
उतना ही
करीब पाता हूँ

तुम्हारे इर्द गिर्द
व्रत्त की परिधि
बन कर
रह गया हूँ मैं ।

Asking for a Date


मैं और तुम
व्रत्त की परिधि के
अलग अलग कोनों में
बैठे दो बिन्दु हैं,

मैनें तो
अपनें हिस्से का
अर्धव्यास पूरा कर लिया,
क्या तुम
मुझसे मिलनें के लिये

केन्द्र पर आओगी ?

6/07/2005

सोचता हूँ ...


ये मेरी देह महकी आज चन्दन सी अचानक क्यों
तुम्हारी साँस चुपके से बदन को छू गई होगी ।

हुए हैं ख्वाब क्यों मेरे अचानक और भी मीठे
तुम्हारी नींद , पलकों मे मेरी, आ सो गई होगी ।

5/24/2005

एक और गीतिका


अर्थ जब खोने लगे
शब्द भी रोने लगे ।

जब वो आदमकद हुए
सब उन्हें बौने लगे ।

ज़ख्म न देखे गये जब
अश्रू से धोने लगे ।

एक जज़्बा था अभी तक
आप तो छूने लगे ।

कब तलक ये ख्वाब देखूँ
वो मेरे होने लगे ।

कब कहानी मोड़ ले ले
आप तो सोने लगे ।


अनूप
२० मई २००५

4/17/2005

चलिये एक शेर और सही ....

मैं सोते सोते चौंक कर उठ जाता हूँ
तुम ने ज़रूर कोई बुरा ख्वाब देखा होगा ।

मेरा सब से मनपसन्द शेर :

कल रात एक अनहोनी बात हो गई
मैं तो जागता रहा खुद रात सो गई ।

अनूप

4/04/2005

Just the Begining

Everyone has to start somewhere. So here I go.
Bear with me. Things can only get better from this point onwards. :-)