12/17/2005

आशंका

मैं हर रोज़
बचपन से पले विश्वासों को
क्षण भर में
काँच के गिलास की तरह
टूट कर बिखरते देखता हूँ ।

सुना है जीने के लिये
कुछ मूल्यों और विश्वासों
का होना ज़रूरी है,
इसलिये मैं
एक बार फ़िर से लग जाता हूँ
नये मूल्यों और विश्वासों
को जन्म देनें में
ये जानते हुए भी
कि इन्हें कल फ़िर टूटना है ।

ये सब तब तक तो ठीक है
जब तक मेरा स्वयं
अपनें आप में विश्वास कायम है,
लेकिन डरता हूँ
उस दिन की कल्पना मात्र से
जब टूटते मूल्यों और विश्वासों
की श्रंखला में
एक दिन
मैं अपनें आप में
विश्वास खो बैठूँगा ।
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5 comments:

अनूप शुक्ला said...

आदर्श-
छोटे हो चुके कपड़ों की मानिन्द
जो,कभी-कभी पहन लिये जाते हैं
दूसरे कपड़े गीले होने पर।


फैशन के दौर में गारंटी की अपेक्षा न रखें।

Pratyaksha said...

जब तक ये डर है, विश्वास भी कायम रहेगा. बहुत अच्छा लिखा, आपने.

एक किरण की भी आशा
अँधेरे में देती है
बल !

फुरसतिया जी, क्या करेंगे जब सारे कपडे ही किसी दिन गीले पड जायें

अनूप शुक्ला said...

गीले कपड़े पहन के भाग जायेंगे पूरब की ओर । सूख जायेंगे कपड़े हवा में।

bentheobold9132 said...

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mauricefisher0925 said...

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