सुनो,
अब अपनी नज़रें उठाओ
और पाँव के अँगूठे से
जमीन को कुरेदना बन्द करो ,
मैं समझ गया पगली
लेकिन कोई ऐसे भी
अपने दिल की बात
कहता है ?
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सुनो ,
तुम जानती हो
मेरा अस्तित्व
तुम से शुरू हो कर
तुम पर खत्म होता है
फ़िर बता सकोगी
मुझे मेरा विस्तार
अनन्त सा क्यों लगता है ?
1/14/2006
सुनो ..... (दो कविताएं)
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3 comments:
adaab
mujhye kuch kehna hai
anoop ji aap na kehte howe bhi bohot kuch keh jate haiN aise visheshta keval chand logoN mai hoti hai
mubarik baad sahit
guldehelve
बहुत सुन्दर अनूप जी।
लक्ष्मीनारायण
बहुत अच्छी कविताएं हैं, बहुत कम शब्दों में बहुत कुछ.. मजा आ गया :-)
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