6/22/2006

प्रत्यक्षा से संवाद

यह कविता संवाद की तरह है। प्रत्यक्षा नें एक कविता लिखी थी, उस के ज़वाब में एक कविता लिखी गई प्रत्यक्षा नें फ़िर कुछ लिखा , फ़िर मैने । यहाँ पूरी कविता दे रहा हूँ । प्रत्यक्षा के लिखे अंश इस रंग में हैं , मेरे लिखे हुए इस रंग में। बताइयेगा प्रयोग कैसा लगा ?

एक टुकडा छत

वृक्ष की जडों के खोह में
अँधेरा कुलबुलाता था
थोडी सी रौशनी
मुट्ठी भर ज़मीन
और एक टुकडा छत
बस इतना ही काफी है
अँधेरे को अपने
काबू में करने के लिये,
मेरी छत
वहाँ से शुरु होती है
जहाँ से तुम्हारी
ज़मीन

खत्म होती है
रौशनी का
एक गोल टुकडा
बरस जाता है
किरणे बुन लेती हैं
अपनी दीवार
और हमारा घर
धूप ,साये, परिंदो
और बादल से
होड लगाता
झूम जाता है
हमारी आँखों में
एक टुकडा छत
वृक्ष की जडों के खोह में

कभी कभी इच्छा होती है
अपनें पैरों के नीचे की जमीन को
खिसका कर
वहाँ तक पहुँचा दूँ
जहाँ से तुम्हारी छत शुरु
होती है,
वो जमीन
जिस पर मेरे पाँव
अब भी टिके हुए हैं
और जिस पर हम नें
मिल कर ख्वाब देखे थे,
वो हसीन ख्वाब आज भी
अगरबत्ती की तरह सुलग रहे है,
पता नहीं खुशबु
तुम्हारी छत तक पहुँची
या नहीं ?

मेरी छत और तुम्हारी छत
की मुंडेर अब बराबर है
तभी तुम्हारी खुशबू
पहुँच जाती है
मुझ तक
मैं बारबार
नंगे पाँव भागकर,
छत पर क्यों आ
जाती हूँ
ये समझ गये हो न
अब !

मुंडेर चाहे
छत के बीच में हो
या सम्बन्धों में,
अच्छी नही लगती ।
छत की मुंडेर तो
लाँघना आसान है
लेकिन ....
तुम भी अपने
रोशनी के
गोल टुकडे से
पूछ कर देखो ना ?

मैंने
रौशनी के उस
गोल टुकडे को
हल्के से
फूँक दिया है
तुम्हारी तरफ
अब तुम्हारा
चेहरा भी
खिल गया है
मेरी तरह

वो रोशनी का
गोल टुकड़ा
क्षितिज से
उगता हुआ
जब मेरी खिड़की
पर आया
तो उस में
हर रोज़ से
कुछ ज्यादा

चमक थी ।
जानता हूँ
तुम्हारा घर
पूरब की ओर है,
क्या तुम
आज सुबह
जल्दी उठ गई थी ?

मैं रात सोई ही

कब थी
खिडकी से चेहरा टिकाये
अंधेरी रात में
कहीं दूर जो
दिया सा टिमटिमाता था
उसे ही देखती रही
सोचती रही
गुनती रही
शायद
तुम भी
ऐसे ही
अपनी खिडकी से
चेहरा टिकाये
मेरी खिडकी की तरफ
देखते होगे


टिमटिमाते हुए
दिये को
मैं भी
बहुत देर तक
देखता रहा
मन बहुत उदास सा था,
लेकिन फ़िर
तुम्हारी खिड़की की ओर
नज़र पड़ी,
तो बुझते हुए दिये
की लौ
अचानक तेज सी
लगने लगी ...

2 comments:

Sarita Jain said...

बहुत ही सुन्दर 'जुगलबन्दी' है । आगे और पढनें की इच्छा रहेगी ।

प्रियंकर said...

सहकारी/सहयोगी लेखन -- कलैबरेटिव राइटिंग --का अनुपम उदाहरण . प्रत्यक्षा में अपरिमित सम्भावनाएं हैं . जुगलबंदी चिरायु हो और जारी रहे .