तुम समन्दर का किनारा हो मैं एक प्यासी लहर की तरह तुम्हे चूमने के लिए उठता हूँ तुम तो चट्टान की तरह वैसी ही खड़ी रहती हो मैं ही हर बार तुम्हे बस छू के लौट जाता हूँ
न तो साहित्य का बड़ा ज्ञाता हूँ, न ही कविता की भाषा को जानता हूँ, लेकिन फ़िर भी मैं कवि हूँ, क्यों कि ज़िन्दगी के चन्द भोगे हुए तथ्यों और सुखद अनुभूतियों को, बिना तोड़े मरोड़े, ज्यों कि त्यों कह देना भर जानता हूं ।
अनूप भार्गव
ज़िन्दगी इक खुली किताब यारो,
पुण्य हैं कम पाप बेहिसाब यारो
2 comments:
वाह, बहुत सुंदर भाव हैं, अनूप जी. बधाई.
Beautiful feelings
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