6/26/2005

यूँ ही बैठे बैठे .......

वो मैय्यत पे मेरी आये और झुक के कान में बोले
सचमुच मर गये हो या नया कोई तमाशा है .........

7 comments:

Jitendra Chaudhary said...

झकास! क्या बात है,
एकदम लगता है, जन्नत से डायरेक्ट लिखी गयी है

अनूप भार्गव said...

हाँ ! जितेन्द्र भाई , इन्टरनेट यहाँ भी पहुँच गया है । :=)
शेष फ़िर .... (जब आप से मुलाकात होगी )

अनूप

आशीष said...

बहुत सही।

आशीष श्रीवास्तव said...

वाह वाह !

तुमसा कोइ दुसरा जमीं पर होगा तो रब से शिकायत होगी
एक तो झेला नही जाता, दुसरा आ गया तो क्या हालत होगी
:-)
-आशीष

Pratyaksha said...

सीने से निकल के दम गया था ,मुद्दतों हुए
कानों में जो आवाज़ उनकी पडी दम फिर निकल गया


ये तो पोस्ट करना ही था..रहा न गया...
वैसे आशीष जी..आपने भी खूब लिखा..
प्रत्यक्षा

अनूप भार्गव said...

प्रत्यक्षा:
अच्छा लिखा है तुम नें ...

कोई तो बात रही होगी भुलाये रिश्तों में
कम्बख्त दम भी निकल रहा है आज किश्तों में

Neeraj said...

Height of irony.

Neeraj