6/21/2005

Asking for a Date


मैं और तुम
व्रत्त की परिधि के
अलग अलग कोनों में
बैठे दो बिन्दु हैं,

मैनें तो
अपनें हिस्से का
अर्धव्यास पूरा कर लिया,
क्या तुम
मुझसे मिलनें के लिये

केन्द्र पर आओगी ?

8 comments:

अनूप शुक्ला said...

बंधुवर ,यह प्रेमनिवेदनीय कविता गणितीय विचलन का शिकार है।एक तो वृत्त में कोने नहीं होते दूसरे परिधि पर कोई केन्द्र नहीं होता।आप तो बैठे हैं परिधि पर और न्योता दे रहे हैं केन्द्र पर मिलने का -माज़रा क्या है? क्या इसी लिये गालिब ने कहा है-इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया, वर्ना आदमी हम भी थे काम के।

अनूप भार्गव said...

बन्धुवर (आप का नाम नहीं पढ पाया):

आप नें कविता को पढा , इस ले लिये धन्यवाद । कविता के बारे में लिखा , इस के लिये और भी धन्यवाद।
आप नें वृत्त के कोनें न होनें की बात शायद ठीक कही (सिर्फ़ गाणित की कक्षा में बैठ कर देखें तो), लेकिन केन्द्र पर मिलनें की बात फ़िर भी सही है ।

कभी परिधि से अर्धव्यास की दूरी तय कर के देखिये और बताइये कि कहाँ मिलना चाहेंगे आप ?

इसी विशय पर एक और कविता लिख रहा हूँ , बताइयेगा कैसी लगी ?

इश्क ने गालिब निकम्मा तो कर दिया, फ़िर भी आदमी कुछ तो हैं काम के।

La Bona said...

R U sure u need a date?

I ahve sometning from the Guru ...

Hi there

Apologies for posting an off topic question here.

I am invitation your views on ABORTION in order to present a case to help those in the developing world.

I personally see abortion as a NECESSARY EVIL and that unwanted pregnancy is not only a personal problem and it is also a very real problem for the society at large.

Do you think it is right to burden say a 15 years old school-going girl with a new life when she is yet to have any economic mean to sustain herself and obviously, most girls of her age are not mentally ready for a family life. Furthermore, is it fair to rob her of her career, aspiration, dream etc., in the name of preserving a life that is yet to be fully developed.

If you have an opinion, please email it to me at divinetalk@gmail.com or if you wish, you may post your comment here: Your Onions Counts!

Thanks, La Bona

अनूप भार्गव said...

ला बोना जी:

मुझे तुम से कुछ भी न चाहिये
मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो ...

आदर के साथ

अनूप :-)

Navneet Bakshi said...

मुझे तो यह चिन्ता है कि अगर ला बोना तुम्हारे पीछे पड़ गई तो डेट-वेट तो तुम सब भूल जाओगे और न ही परिधि, बिन्दुओं और केन्द्रों की बात करोगे क्योंकि पहले तो तुम्हें वह अबॉर्शन का कारण बनायेगी और फिर तुम्हें अबॉर्शन करवाने के नाम से डरायेगी मतलब ये कि अगर अब तक तुम समझते हो कि तुम वाकई किसी काम के हो तो वो तुम्हारा यह भ्रम भी दूर कर देगी उस की आवाज़ तुम्हें कानों में गूँजती सुनाई देगी " तू जहाँ-जहाँ चलेगा, मेरा साया साथ होगा" And then you will become a real poet, writing more about "figure" and less about circles... Navneet Bakshi

Navneet Bakshi said...

मुझे तो यह चिन्ता है कि अगर ला बोना तुम्हारे पीछे पड़ गई तो डेट-वेट तो तुम सब भूल जाओगे और न ही परिधि, बिन्दुओं और केन्द्रों की बात करोगे क्योंकि पहले तो तुम्हें वह अबॉर्शन का कारण बनायेगी और फिर तुम्हें अबॉर्शन करवाने के नाम से डरायेगी मतलब ये कि अगर अब तक तुम समझते हो कि तुम वाकई किसी काम के हो तो वो तुम्हारा यह भ्रम भी दूर कर देगी उस की आवाज़ तुम्हें कानों में गूँजती सुनाई देगी " तू जहाँ-जहाँ चलेगा, मेरा साया साथ होगा" And then you will become a real poet, writing more about "figure" and less about circles... Navneet Bakshi

priyankar said...

अनूप भाई! क्या कविता है .पढ़ कर आनन्द आया. कहन की शैली में नवीनता न हो तो बात बनती नहीं है. वृत्त के कोने और परिधि के केन्द्र कोई कवि ही देख सकता है गणितज्ञ नहीं . इसी को तो साहित्यशास्त्र में 'पोएटिक लाइसेंस' कहते हैं. काव्य सत्य हमेशा उपलब्ध और जगजाहिर तथ्य से बड़ा होता है क्योंकि वह एक विराट सत्य की ओर संकेत करता है जो हमेशा तथ्यात्मक नहीं होता . रामचरित मानस में लंका काण्ड का प्रसंग देखें -- लक्ष्मण शक्ति के लगने से मूर्छित और घायल अवस्था में पड़े है,हनुमान संजीवनी बूटी लेकर अभी तक नहीं लौटे हैं,चिन्तातुर राम बहुत दुखी और विदग्ध मन से कहते हैं :

अस बिचारि जियं जागहु ताता ।
मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ॥

क्या राम यह नहीं जानते थे कि लक्ष्मण उनके सहोदर भाई नहीं हैं या तुलसीदास यह तथ्य नहीं जानते थे . बल्कि तुलसी तो थोड़ी ही देर बाद राम से यह कहलवा भी देते हैं कि :

'निज जननी के एक कुमारा'

तब ऐसी भूल क्यों हुई? यह भूल नहीं काव्य सत्य है . राम और लक्ष्मण में ऐसा प्रेम था जैसा जैसा सहोदर भाइयों में होता है. या कह सकते हैं कि सहोदर भाइयों से भी बढ़ कर प्रेम था और राम के लिए यह तथ्य महत्वहीन था कि लक्ष्मण उनके सहोदर भाई नहीं हैं. यही विराट सत्य है जिसे दुनियादार लोग नहीं देख पाते . आप गणित में भी कविता देख पाते हैं और श्रीमान प्रश्नवाचक कविता में भी गणित खोजने का प्रयास कर रहे हैं बस यही अंतर है आप दोनों में . विचलन कविता में नहीं प्रश्नवाचक जी की समझ में है . कविता का एक छोर कवि के पास होता है दूसरा कवि-हृदय पाठक के पास . यहां दूसरा छोर मात्र पाठक है,कवि हृदय नहीं .

प्रियंकर said...

कृपया मेरी प्रतिक्रिया में 'यह कहलवा भी देते हैं' के स्थान पर 'यह भी कहलवा देते हैं' पढ़ें . जल्दबाजी में लिखने से कई बार अभिप्राय बदल बदल जाते हैं . असुविधा के लिए खेद है .