7/09/2005

प्रत्यक्षा की कुछ पँक्तियों पर ....

प्रत्यक्षा नें लिखा ....

सीने से निकल के दम गया था ,मुद्दतों हुए
कानों में जो आवाज़ उनकी पडी दम फिर निकल गया

इस पर अर्ज़ किया है ..

कुछ तो रहा होगा भुलाये रिश्तों में
दम भी निकल रहा है आज किश्तों में ।

अनूप

4 comments:

Pratyaksha said...

ये दम क्यों है मेरा
बडा बेरहम सा
निकलते निकलते
बचा कुछ है कम सा
किश्तों में भी रह गया
कुछ असर सा
आँखें खुली रह गईं
इस भरम में
कि देखें तुम्हें भी
दीदाये तर सा


प्रत्यक्षा

अनूप भार्गव said...

प्रत्यक्षा:
शायद अमीर खुसरो की पँक्तियाँ हैं , याद आ रही हैं :
कागा सब तन खाइयो
और चुन चुन खाइयो माँस
दो नयना मत खाइयो
मोहे पिया मिलन की आस

अमीर खुसरो

tarushree said...

bahut sundar sher hai anoop.... man kar raha hai mai bhi kuch kah doon...
ek pal me dam nikalne ki ummed rah gayi thi,
tujhe tujhse churane ki kashish bah gayi thi,
tum ate to thahar jata man bhi...
mujhe tum se bichchadne ki shikayat rah gayi thi.
Tarushree

Shilpa Bhardwaj said...

Anoop ji,

On your beautiful lines, I am reminded of some lines which present a completely different perspective of a relationship... may be a different relationship all together.

Saamne aaya mere, dekha,
mujhse baat bhi ki.
Muskuraye bhi,
purane kisi rishtey ke liye.

Kal ka akhbaar tha, bas dekh liya.
Rakh bhi diya.