वाह ! (लेकिन ओह ! तेरे चेहरे पर वो कहानी देखूँ किरदार गये वक्तों में ..था तो मैं ही पर , अलास (अंग्रेज़ी वाला ) हीरो था कोई और और मैं सिर्फ कॉमेडी रोल की चार लाईना ही ..) अब जूते चप्पल मत मारियेगा :-)
नीरज जी, पारुल ! मुक्तक पसन्द करने के लिये धन्यवाद । समीर ! उस 'कहानी की कहानी' तो कभी फ़ुरसत से सुनायेंगे । प्रत्यक्षा ! हाँ ’रोल’ बदल जाने से कहानी कितनी बदल जाती है ? :-) । तुम्हारी ज़मीन पर चार लाइना हाज़िर हैं :
ढलते मौसम में इक शाम सुहानी देखूँ अपनी तस्वीर भी देखूँ तो पुरानी देखूँ आरजु ऐसी न थी ये वक्त भी आ जायेगा अपने सर पे तेरे जूतों की निशानी देखूँ :-)
न तो साहित्य का बड़ा ज्ञाता हूँ, न ही कविता की भाषा को जानता हूँ, लेकिन फ़िर भी मैं कवि हूँ, क्यों कि ज़िन्दगी के चन्द भोगे हुए तथ्यों और सुखद अनुभूतियों को, बिना तोड़े मरोड़े, ज्यों कि त्यों कह देना भर जानता हूं ।
21 comments:
वाह !
(लेकिन ओह !
तेरे चेहरे पर वो कहानी देखूँ
किरदार गये वक्तों में ..था तो मैं ही
पर , अलास (अंग्रेज़ी वाला ) हीरो था कोई और
और मैं सिर्फ
कॉमेडी रोल की चार लाईना ही ..)
अब जूते चप्पल मत मारियेगा :-)
अनूप जी
कितने कम शब्दों में कितनी सारी बात कह गए आप. वाह. बहुत खूब.
नीरज
bahut badhiyaa...
बहुत उम्दा.
कभी मौका लगे तो वो कहानी भी सुनाईयेगा जिसमें आप किरदार थे. :)
नीरज जी, पारुल ! मुक्तक पसन्द करने के लिये धन्यवाद ।
समीर ! उस 'कहानी की कहानी' तो कभी फ़ुरसत से सुनायेंगे ।
प्रत्यक्षा ! हाँ ’रोल’ बदल जाने से कहानी कितनी बदल जाती है ? :-) । तुम्हारी ज़मीन पर चार लाइना हाज़िर हैं :
ढलते मौसम में इक शाम सुहानी देखूँ
अपनी तस्वीर भी देखूँ तो पुरानी देखूँ
आरजु ऐसी न थी ये वक्त भी आ जायेगा
अपने सर पे तेरे जूतों की निशानी देखूँ
:-)
अच्छी प्रस्तुति.....गहरा ख़याल.
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डा.चंद्रकुमार जैन
अब वाकई आपने जूता क्या सर भी तोड़ डाला :)))
बढ़िया ..
ढलते मौसम में इक शाम सुहानी देखूँ
अपनी तस्वीर भी देखूँ तो पुरानी देखूँ
आरजु ऐसी न थी ये वक्त भी आ जायेगा
अपने सर पे तेरे जूतों की निशानी देखूँ
ये ज्यादा बढ़िया...
वाह सर जी....आप तो छा गये
aur muktako ka intajar hai |
वाह-वाह बंधुवर,
मजा आ गया..
अन्य मुक्तकों की प्रतीक्षा रहेगी..
bhaut achha
अनूप जी,
आपकी रचनायें देखी। ये गम्भीरं भावबोध और सहज अभिव्यक्ति की रचनायें हैं। बधाई! शुभकामनायें!
संध्या
aapne khwab bunna kyoon band kar diya, likhna kyoon band kar diya?
guptasandhya.blogspot.com
भाई अनूप जी
मुक्तक मन को छू गया ।
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
एक पूरी की पूरी कहानी कह जाता है यह मुक्तक .....
मैं जिसमे किरदार हुआ करता था
तेरे चेहरे पे वो कहानी देखूँ ।
बेहद मासूम पंक्तियाँ हैं यह ............
मीठी यादों की एक निशानी देखूँ
जज़्बों में पहचान पुरानी देखूँ
मैं जिसमे किरदार हुआ करता था
तेरे चेहरे पे वो कहानी देखूँ ।
Wah bhot khoob......!!!
वाह -वाह
बहुत खूबसूरत शेर
.
www.dwijendradwij.blogspot.com
ढलते मौसम में इक शाम सुहानी देखूँ
अपनी तस्वीर भी देखूँ तो पुरानी देखूँ
आरजु ऐसी न थी ये वक्त भी आ जायेगा
अपने सर पे तेरे जूतों की निशानी देखूँ
hahahahahahahahahahah
vaah- vaah
मीठी यादों की एक निशानी देखूँ
जज़्बों में पहचान पुरानी देखूँ
मैं जिसमे किरदार हुआ करता था
तेरे चेहरे पे वो कहानी देखूँ ......
Waah Waah....! Bhot koob.....
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