गुज़रे चन्द रोशन पलों से मिलाती है यह धूप ज़माने की सर्द हवायों से बचाती है यह धूप कैसे जाने दूँ इसको मुठ्ठीी से फिसल मेरी आत्मा न जाएगी देह से निकल ? इसी से हुया जीवन में सवेरा इसी से छंटा गहन काला अंधेऱा न माँगो मुझसे मेरी इकलौती भोर मेरी मुठ्ठी में इसके सिवाय कुछ न और ।।
न तो साहित्य का बड़ा ज्ञाता हूँ, न ही कविता की भाषा को जानता हूँ, लेकिन फ़िर भी मैं कवि हूँ, क्यों कि ज़िन्दगी के चन्द भोगे हुए तथ्यों और सुखद अनुभूतियों को, बिना तोड़े मरोड़े, ज्यों कि त्यों कह देना भर जानता हूं ।
अनूप भार्गव
ज़िन्दगी इक खुली किताब यारो,
पुण्य हैं कम पाप बेहिसाब यारो
4 comments:
कौन चाहता है कि सुबह हो,
रात के जीवन मे जो मजा,
वह दिन मे कहां|
गुज़रे चन्द रोशन पलों से
मिलाती है यह धूप
ज़माने की सर्द हवायों से
बचाती है यह धूप
कैसे जाने दूँ इसको
मुठ्ठीी से फिसल
मेरी आत्मा न जाएगी
देह से निकल ?
इसी से हुया
जीवन में सवेरा
इसी से छंटा
गहन काला अंधेऱा
न माँगो मुझसे
मेरी इकलौती भोर
मेरी मुठ्ठी में
इसके सिवाय कुछ न और ।।
याद रखना
फिर मुझे
दोष न देना
अगर सवेरा हो जाये
धूप मुट्ठी से निकलकर
बहक जाये …
Lovely lines, Anoop. Well written.
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