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12/02/2006

दो ताजा शेर

तेरे इश्क के ज़ुनून में हम ने ये अजब काम किया है
पहले तुझे आवाज़ दीं फ़िर खुद ही ज़वाब दिया है ।

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छू लिया आ कर के तूने इस तरह मेरा वज़ूद
साँस भी तेरी मुझे अब अपने जैसी ही लगे है
।

8/31/2006

दो पंक्तियाँ :

रजनी के लिये :

तुम सिर्फ़ एक पँक्ति में कुछ इस तरह समाती हो
स्वयं अगरबत्ती सी सुलगती हो मुझ को मह्काती हो ।

11/19/2005

एक शेर देखिये

आसमां मे खलबली है, सब यही पूछा किये
कौन फ़िरता है ज़मीं पर, चाँद सा चेहरा लिये

7/20/2005

एक शेर लिखा है .....


वो पलक मूँद कर हौले से मुस्कुराये हैं
उन के तस्सवुर में जानें कौन आया है

अनूप

7/09/2005

प्रत्यक्षा की कुछ पँक्तियों पर ....

प्रत्यक्षा नें लिखा ....

सीने से निकल के दम गया था ,मुद्दतों हुए
कानों में जो आवाज़ उनकी पडी दम फिर निकल गया

इस पर अर्ज़ किया है ..

कुछ तो रहा होगा भुलाये रिश्तों में
दम भी निकल रहा है आज किश्तों में ।

अनूप

6/28/2005

चलिये इसी दौर में .....

एक अरसा हुआ दम को निकले हुए
हाथ उस नें जो छूआ तो ज़ुम्बिश हुई ।

6/26/2005

यूँ ही बैठे बैठे .......

वो मैय्यत पे मेरी आये और झुक के कान में बोले
सचमुच मर गये हो या नया कोई तमाशा है .........

6/07/2005

सोचता हूँ ...


ये मेरी देह महकी आज चन्दन सी अचानक क्यों
तुम्हारी साँस चुपके से बदन को छू गई होगी ।

हुए हैं ख्वाब क्यों मेरे अचानक और भी मीठे
तुम्हारी नींद , पलकों मे मेरी, आ सो गई होगी ।

4/17/2005

चलिये एक शेर और सही ....

मैं सोते सोते चौंक कर उठ जाता हूँ
तुम ने ज़रूर कोई बुरा ख्वाब देखा होगा ।

मेरा सब से मनपसन्द शेर :

कल रात एक अनहोनी बात हो गई
मैं तो जागता रहा खुद रात सो गई ।

अनूप