तेरे इश्क के ज़ुनून में हम ने ये अजब काम किया है
पहले तुझे आवाज़ दीं फ़िर खुद ही ज़वाब दिया है ।
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छू लिया आ कर के तूने इस तरह मेरा वज़ूद
साँस भी तेरी मुझे अब अपने जैसी ही लगे है ।
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12/02/2006
8/31/2006
दो पंक्तियाँ :
रजनी के लिये :
तुम सिर्फ़ एक पँक्ति में कुछ इस तरह समाती हो
स्वयं अगरबत्ती सी सुलगती हो मुझ को मह्काती हो ।
तुम सिर्फ़ एक पँक्ति में कुछ इस तरह समाती हो
स्वयं अगरबत्ती सी सुलगती हो मुझ को मह्काती हो ।
11/19/2005
7/20/2005
7/09/2005
प्रत्यक्षा की कुछ पँक्तियों पर ....
प्रत्यक्षा नें लिखा ....
सीने से निकल के दम गया था ,मुद्दतों हुए
कानों में जो आवाज़ उनकी पडी दम फिर निकल गया
इस पर अर्ज़ किया है ..
कुछ तो रहा होगा भुलाये रिश्तों में
दम भी निकल रहा है आज किश्तों में ।
अनूप
सीने से निकल के दम गया था ,मुद्दतों हुए
कानों में जो आवाज़ उनकी पडी दम फिर निकल गया
इस पर अर्ज़ किया है ..
कुछ तो रहा होगा भुलाये रिश्तों में
दम भी निकल रहा है आज किश्तों में ।
अनूप
6/28/2005
6/26/2005
यूँ ही बैठे बैठे .......
वो मैय्यत पे मेरी आये और झुक के कान में बोले
सचमुच मर गये हो या नया कोई तमाशा है .........
सचमुच मर गये हो या नया कोई तमाशा है .........
6/07/2005
सोचता हूँ ...
ये मेरी देह महकी आज चन्दन सी अचानक क्यों
तुम्हारी साँस चुपके से बदन को छू गई होगी ।
हुए हैं ख्वाब क्यों मेरे अचानक और भी मीठे
तुम्हारी नींद , पलकों मे मेरी, आ सो गई होगी ।
4/17/2005
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