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4/06/2007

मुक्तक

वो लाज को आँखों में छुपाये तो छुपाये कैसे
वो मुझ से दूर भी अगर जाये तो जाये कैसे
वो मेरी रूह की हर रग रग में शामिल है
वो मुझ से बदन को चुराये तो चुराये कैसे ?

1/10/2007

मुक्तक

गुनगुनी सी हवा है बहूँ ना बहूँ
अजनबी वेदना है सहूँ ना सहूँ
मुस्कुराते हुए गीत और छन्द में
अनमनी सी व्यथा है कहूँ ना कहूँ ?

12/23/2006

दो मुक्तक

तुम को देखा तो चेहरे पे नूर आ गया
हौले हौले ज़रा सा सुरूर आ गया
तुम जो बाँहों में आईं लजाते हुए
हम को खुद पे ज़रा सा गुरूर आ गया

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ज़िन्दगी गुनगुनाई , कहो क्या करें ?
चाँदनी मुस्कुराई, कहो क्या करें ?
मुद्दतों की तपस्या है पूरी हुई
आप बाँहों में आईं, कहो क्या करें ?

10/22/2006

एक मुक्तक

हार कर जो न हारे, जवानी लिखो
दिल में गड़ जाये गहरी, निशानी लिखो
ख्वाब की आबरु को बचाना ही है
उन अधूरे पलों को, कहानी लिखो ।

10/20/2006

शुभ कामनाएं

दीपिका की ज्योत बस जलती रहे
स्नेह की सरिता यूँ ही बहती रहे
आप जैसे दोस्तों का साथ हो
ज़िन्दगी यूँ ही सदा हँसती रहे

दीप पर्व की ढेर सारी शुभ कामनाओं के साथ :

10/09/2006

पाँच मुक्तक .... तुम्हारे लिये

१.
प्रणय की प्रेरणा तुम हो
विरह की वेदना तुम हो
निगाहों में तुम्ही तुम हो
समय की चेतना तुम हो ।

२.
तृप्ति का अहसास तुम हो
बिन बुझी सी प्यास तुम हो
मौत से अब डर नहीं है
ज़िन्दगी की आस तुम हो ।

३.
सपनों का अध्याय तुम्ही हो
फ़ूलों का पर्याय तुम्ही हो
एक पंक्ति में अगर कहूँ तो
जीवन का अभिप्राय तुम्ही हो ।

४.
सुख दुख की हर आशा तुम हो
चुम्बन की अभिलाशा तुम हो
मौत के आगे जाने क्या हो
जीवन की परिभाषा तुम हो ।

५.
ज़िन्दगी को अर्थ दे दो
इक नया सन्दर्भ दे दो
दूर कब तक यूँ रहोगी
नेह का सम्पर्क दे दो ।

7/30/2006

दो मुक्तक

१.

रात इक शबनमी है चले आइये
आँसुओं में नमी है चले आइये
अब उजाला कहीं दीख पड़ता नहीं
चाँदनी की कमी है चले आइये

२.

नज़ारे बेमिसाल देखे हैं
हादसे और कमाल देखे हैं
मैं ढूँढ रहा हूँ हल जिनका
तेरी चुप में सवाल देखे हैं ।


11/30/2005

दो मुक्तक

साकी तेरी महफ़िल में एक मेहमान अभी बाकी है
तेरी मय का, तेरे रूप का कदरदान अभी बाकी है
इस तरह कैसे उठ जाऊँ कहानी अधूरी छोड़ कर ऐसे
तूनें रुख से नकाब उठाया है मेरा इम्तहान अभी बाकी है ।

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महफ़िल में थिरकनें को मचलता साज़ काफ़ी है
दिल में गहरी उतरने को तेरी आवाज़ काफ़ी है
नहीं संकोच कर साकी छीन ले जाम मदिरा का
मुझे मदहोश करनें को तेरा अंदाज़ काफ़ी है ।

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9/13/2005

एक मुक्तक

माना कि हर समस्या का निदान नहीं हूँ मैं
ये भी माना कि तेरे प्रश्न का समाधान नहीं हूँ मैं
लेकिन तुम्हारी प्रीति के आमँत्रण का मतलब नहीं समझूँ
मेरी बात मानों इतना नादान नहीं हूँ मैं ।


अनूप